जन्म से टेढ़े थे… फिर भी राजा जनक को दिया ज्ञान | अष्टावक्र की सच्ची कहानी
ऋषि अष्टावक्र की यह अद्भुत और प्रेरणादायक कथा हमें आत्मज्ञान, सत्य और आंतरिक शक्ति का वास्तविक अर्थ समझाती है। एक ऐसे महाज्ञानी की कहानी, जिनका शरीर जन्म से ही आठ स्थानों से वक्र था, लेकिन जिनकी बुद्धि और चेतना इतनी प्रखर थी कि उन्होंने राजाओं और विद्वानों तक को ज्ञान का सच्चा मार्ग दिखाया। बचपन से ही असाधारण प्रतिभा के धनी अष्टावक्र ने अपने पिता के वेद पाठ में त्रुटि सुधारकर यह सिद्ध कर दिया था कि सच्चा ज्ञान उम्र या रूप का मोहताज नहीं होता। पिता के शाप के कारण उनका शरीर भले ही टेढ़ा-मेढ़ा हो गया, लेकिन उनके भीतर की दिव्यता और आत्मबोध ने उन्हें महान बना दिया।
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